चार्जशीट (आरोप-पत्र) FIR के बाद पुलिस की जाँच का आख़िरी दस्तावेज़ है, जो अदालत में दाखिल होता है — इसमें पुलिस बताती है कि किस पर, किन धाराओं में, किन सबूतों के साथ मुक़दमा चलना चाहिए। यह BNSS (पुरानी CrPC की जगह) की प्रक्रिया के तहत बनती है। FIR से ट्रायल तक का पूरा रास्ता, 60/90 दिन का नियम और आगे क्या होता है — सब नीचे है।
FIR → जाँच → चार्जशीट → कोर्ट — पूरा रास्ता
FIR दर्ज — संज्ञेय अपराध की सूचना पर थाने में। यहीं से जाँच की घड़ी शुरू होती है।
जाँच — बयान, मौका-मुआयना, बरामदगी, फोरेंसिक/मेडिकल रिपोर्ट। ज़रूरत पर गिरफ़्तारी या नोटिस (BNSS की धारा 35 — पुराना 41A)।
नतीजा — सबूत मिले तो चार्जशीट; न मिलें तो closure report (फर्क नीचे)।
कोर्ट cognizance — मजिस्ट्रेट चार्जशीट पढ़कर मुक़दमे का संज्ञान लेता है, आरोपी को summon/warrant जाता है।
Charges frame — अदालत तय करती है कि किन धाराओं पर ट्रायल चलेगा; आरोपी दोषी/निर्दोष होने का जवाब देता है।
ट्रायल — गवाही, जिरह, बहस — और अंत में फ़ैसला।

आपकी FIR में जो धारा लिखी है, उसका मतलब यहाँ समझें: धारा 420/BNS 318 · धारा 324/BNS 118 · सभी धाराएं।
कितने दिन में दाखिल होती है — 60/90 दिन का नियम
जाँच की कोई ऊपरी सीमा नहीं है, पर हिरासत की है — और वहीं से मशहूर 60/90 दिन आते हैं (सटीक प्रावधान BNSS के Bare Act से पुष्टि करें):
| अपराध की गंभीरता | हिरासत में चार्जशीट की सीमा | न आए तो |
|---|---|---|
| 10 वर्ष+/उम्रक़ैद/मृत्युदंड वाले | 90 दिन | Default bail — आरोपी का अधिकार बन जाता है |
| बाकी मामले | 60 दिन |
आरोपी हिरासत में नहीं है, तो जाँच लंबी भी चल सकती है — 60/90 दिन वाला दबाव सिर्फ़ हिरासत से जुड़ा है।
चार्जशीट में क्या-क्या होता है
चार्जशीट के बाद आरोपी का क्या होता है
- Summon आता है — तय तारीख़ पर अदालत में पेश होना है; न जाएँ तो warrant बन सकता है।
- दस्तावेज़ मिलते हैं — चार्जशीट और सबूतों की कॉपी पाने का हक़ है (नीचे देखें)।
- Charges frame होते हैं — यहीं वकील बहस करके कमज़ोर धाराएं हटवाने (discharge) की कोशिश कर सकता है।
- ट्रायल शुरू — इसके बाद मामला गवाही-सबूत पर चलता है।
चार्जशीट से नाम निकल सकता है? — closure report से फर्क
| चार्जशीट | Closure report | |
|---|---|---|
| पुलिस का निष्कर्ष | मुक़दमा बनता है | सबूत नहीं मिले |
| आगे | Cognizance → ट्रायल | मजिस्ट्रेट मंज़ूर करे तो केस बंद; शिकायतकर्ता protest petition दे सकता है |
चार्जशीट दाखिल होने के बाद नाम निकलवाने के रास्ते: charges frame के समय discharge की अर्ज़ी, या उपयुक्त मामलों में High Court में कार्यवाही रद्द (quashing) की याचिका — दोनों वकील के ज़रिए। समझौता-योग्य (compoundable) धाराओं में आपसी समझौते से भी मामला खत्म हो सकता है — लोक अदालत ऐसे मामलों का एक रास्ता है।
आरोपी को कॉपी कैसे मिलती है
Cognizance के बाद अदालत आरोपी को चार्जशीट और साथ के दस्तावेज़ों की मुफ़्त कॉपी दिलवाती है — यह अधिकार है, माँगना न भूलें। कई राज्यों में eCourts/CIS से केस की स्थिति और आदेश ऑनलाइन भी दिखते हैं (ecourts.gov.in पर CNR नंबर से)। गवाहों के संवेदनशील ब्योरे अदालत की अनुमति से ही मिलते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
FIR और चार्जशीट में क्या अंतर है?
FIR जाँच की शुरुआत है — सिर्फ़ सूचना। चार्जशीट जाँच का नतीजा है — सबूतों के साथ अदालत से मुक़दमा चलाने की माँग।
कैसे पता चलेगा कि मेरी चार्जशीट दाखिल हुई?
अदालत से summon आता है; उससे पहले ecourts.gov.in पर FIR/CNR नंबर से केस खोजकर देख सकते हैं, या थाने/अपने वकील से पूछें।
चार्जशीट कब तक दाखिल न हो तो केस खत्म हो जाता है?
केस अपने आप खत्म नहीं होता — 60/90 दिन की सीमा सिर्फ़ हिरासत से जुड़ी है (default bail)। बिना हिरासत वाली जाँच लंबी चल सकती है, हालाँकि बेवजह देरी को अदालत में चुनौती दी जा सकती है।
क्या चार्जशीट के बाद ज़मानत हो सकती है?
हाँ — चार्जशीट के बाद भी ज़मानत की अर्ज़ी चलती है; कई बार जाँच पूरी हो जाने को ज़मानत के पक्ष की दलील बनाया जाता है। धारा और मामले पर निर्भर है।
Supplementary chargesheet क्या होती है?
पहली चार्जशीट के बाद नए सबूत/नए आरोपी मिलें तो पुलिस पूरक (supplementary) चार्जशीट दाखिल कर सकती है — जाँच उतने हिस्से के लिए खुली रहती है।
स्रोत
प्रक्रिया BNSS (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) पर आधारित — धारा-संख्याएँ और समय-सीमाएँ indiacode.nic.in के Bare Act से पुष्टि करें; केस की स्थिति: ecourts.gov.in। अस्वीकरण: यह लेख सामान्य जानकारी है, कानूनी सलाह नहीं — अपने मामले में वकील से राय लें।