धारा 420 धोखाधड़ी (छल) से जुड़ी IPC की सबसे जानी-पहचानी धारा थी। 1 जुलाई 2024 से लागू नए कानून भारतीय न्याय संहिता (BNS) में यह धारा 318 बन चुकी है। इस लेख में जानिए यह धारा कब लगती है, सज़ा क्या है और जमानत मिलती है या नहीं।
यह धारा कब लगती है?

जब कोई व्यक्ति किसी को बेईमानी से धोखा देकर संपत्ति, पैसा या कीमती चीज़ हासिल करता है, तो यह धारा लगती है। उदाहरण — नकली नौकरी का झांसा देकर पैसे लेना, नकली स्कीम में निवेश कराना, या धोखे से दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करवाना।
सज़ा क्या मिलती है?
BNS धारा 318(4) के तहत — 7 वर्ष तक कारावास और जुर्माना, दोनों हो सकते हैं। धोखाधड़ी की गंभीरता के हिसाब से सज़ा की अवधि तय होती है।
जमानत मिलती है या नहीं?
यह गैर-जमानती (non-bailable) अपराध है — जमानत सीधे थाने से नहीं, कोर्ट से लेनी पड़ती है। यह संज्ञेय अपराध भी है, यानी पुलिस बिना वारंट गिरफ़्तार कर सकती है।
IPC धारा 420 vs BNS धारा 318 — क्या बदला?
| IPC 420 (पुराना) | BNS 318 (नया) | |
|---|---|---|
| अपराध | छल और बेईमानी से संपत्ति दिलाना | वही परिभाषा, सरल भाषा में |
| सज़ा | 7 वर्ष तक + जुर्माना | 7 वर्ष तक + जुर्माना |
| लागू | 30 जून 2024 तक के मामले | 1 जुलाई 2024 से |
अगर आप पर यह धारा लगी है तो क्या करें?
- तुरंत किसी अनुभवी आपराधिक वकील से संपर्क करें।
- FIR की कॉपी लें — यह आपका अधिकार है।
- कोई भी दस्तावेज़/लेन-देन का सबूत संभाल कर रखें।
- अग्रिम जमानत (anticipatory bail) के विकल्प पर वकील से बात करें।
420 बनाम सिविल विवाद — असली फर्क नीयत का है
यह वह सवाल है जिस पर ज़्यादातर 420 के मामले खड़े या ख़ारिज होते हैं: धोखे की नीयत शुरू से थी या नहीं।
एक उदाहरण से समझें — रमेश ने सुरेश को दुकान के माल के लिए ₹2 लाख एडवांस दिए। अब दो स्थितियाँ:
- सुरेश ने माल देने का इरादा ही नहीं था — फ़र्ज़ी बिल दिखाए, पैसा लेकर फ़ोन बंद कर लिया। यह शुरुआत से बेईमान नीयत है — धोखाधड़ी (BNS 318) बनती है।
- सुरेश का इरादा सही था, पर बाद में घाटा हो गया और पैसा नहीं लौटा पाया। यह सिविल विवाद (recovery suit) है — पुलिस केस नहीं, अदालत में वसूली का मामला।
BNS धारा 318 के चार हिस्से — सज़ा किस हिस्से में कितनी
IPC में 420 एक धारा थी; BNS 318 में धोखाधड़ी की गंभीरता के हिसाब से अलग-अलग हिस्से हैं (सटीक शब्दावली अधिनियम से पुष्टि करें):
| हिस्सा | कब | सज़ा तक |
|---|---|---|
| 318(1) | धोखाधड़ी की परिभाषा | — |
| 318(2) | सामान्य धोखाधड़ी | 3 वर्ष / जुर्माना / दोनों |
| 318(3) | जिसकी रक्षा का दायित्व था, उसी से धोखा | 5 वर्ष + जुर्माना |
| 318(4) | धोखे से संपत्ति/पैसा दिलवाना (पुरानी 420 वाली स्थिति) | 7 वर्ष + जुर्माना |
FIR से मुक़दमे तक — प्रक्रिया क्या रहती है
शिकायत/FIR — थाने में या SP को; ऑनलाइन ठगी है तो 1930/cybercrime.gov.in सबसे पहले (नीचे देखें)।
जाँच — बयान, दस्तावेज़, बैंक ट्रेल। संज्ञेय अपराध है, पर 7 वर्ष तक सज़ा वाले मामलों में गिरफ़्तारी से पहले BNSS की नोटिस प्रक्रिया (पुराना 41A) आम है।
चार्जशीट या क्लोज़र — सबूत मिले तो अदालत में चार्जशीट, वरना क्लोज़र रिपोर्ट (जिस पर शिकायतकर्ता आपत्ति दे सकता है)।
ट्रायल — मजिस्ट्रेट अदालत में; समझौते की गुंजाइश सीमित मामलों में अदालत की अनुमति से।
ऑनलाइन ठगी हुई है? पहले 1930 — फिर बाकी सब
UPI/खाते से पैसा गया हो तो सबसे पहला कदम थाना नहीं, साइबर हेल्पलाइन 1930 है — जितनी जल्दी कॉल, पैसा फ़्रीज़ होने की उतनी संभावना। साथ में cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज करें और उसका acknowledgment नंबर सँभालें — यही आगे FIR का आधार बनता है। (प्रक्रिया पोर्टल से पुष्टि करें)
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या धारा 420 अब भी लगती है?
30 जून 2024 तक हुए अपराधों पर IPC 420 लगती है; 1 जुलाई 2024 के बाद के मामलों में BNS धारा 318 लगती है।
क्या समझौते से केस खत्म हो सकता है?
कुछ स्थितियों में कोर्ट की अनुमति से compound किया जा सकता है — वकील से सलाह लें।
क्या पुलिस बिना वारंट गिरफ़्तार कर सकती है?
हाँ, यह संज्ञेय अपराध है — लेकिन गिरफ़्तारी के नियमों (BNSS) का पालन ज़रूरी है।
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