धारा 307 हत्या के प्रयास (attempt to murder) की धारा है — यानी किसी को जान से मारने की नीयत से किया गया हमला, जिसमें मौत नहीं हुई। 1 जुलाई 2024 से लागू नए कानून भारतीय न्याय संहिता (BNS) में यह अब धारा 109 है। सज़ा 10 साल तक, और चोट पहुंची हो तो आजीवन कारावास तक — यह गैर-जमानती और संज्ञेय अपराध है।
यह धारा कब लगती है? (नीयत सबसे अहम)
सिर्फ़ चोट लगना काफ़ी नहीं — यह साबित होना ज़रूरी है कि काम "मारने की नीयत या जानकारी" से किया गया था। यानी अगर वही काम मौत में बदल जाता तो वह हत्या होती। इसीलिए अदालतें हथियार, चोट की जगह (सिर/छाती जैसे नाज़ुक अंग), वार की ताक़त और परिस्थितियों को देखती हैं।
- आसान उदाहरण: गोली चलाना पर निशाना चूक जाना, गला दबाना, ज़हर देना, सिर पर घातक वार करना।
- 307 नहीं लगेगी: झगड़े में हाथापाई या मामूली चोट — वहां दूसरी धाराएं (जैसे साधारण चोट की धारा) लगती हैं।
- चोट लगना ज़रूरी नहीं — कोशिश साबित हो जाए तो बिना चोट के भी धारा लगती है।
सज़ा के 3 स्तर (BNS 109)

| स्थिति | सज़ा |
|---|---|
| हत्या का प्रयास (चोट नहीं) | 10 वर्ष तक कारावास + जुर्माना |
| प्रयास में चोट पहुंची | आजीवन कारावास तक, या 10 वर्ष तक + जुर्माना |
| आजीवन कारावास काट रहे व्यक्ति द्वारा प्रयास (चोट सहित) | मृत्युदंड तक की सज़ा संभव |
जमानत क्यों मुश्किल होती है?
धारा 307 (BNS 109) गैर-जमानती और संज्ञेय अपराध है — यानी पुलिस बिना वारंट गिरफ़्तार कर सकती है और जमानत थाने से नहीं, अदालत से ही मिलती है। मुक़दमा सत्र न्यायालय (Court of Session) में चलता है।
- अदालत देखती है: चोट कितनी गंभीर, हथियार कौन-सा, आरोपी का पिछला रिकॉर्ड, गवाहों को प्रभावित करने का ख़तरा।
- पहले सत्र न्यायालय में ज़मानत अर्ज़ी, वहां ख़ारिज हो तो हाईकोर्ट।
- गिरफ़्तारी से पहले आशंका हो तो अग्रिम जमानत (anticipatory bail) का विकल्प वकील से पूछें।
IPC 307 vs BNS 109 — क्या बदला?
| IPC धारा 307 (पुराना) | BNS धारा 109 (नया) | |
|---|---|---|
| अपराध | हत्या का प्रयास | वही — हत्या का प्रयास |
| सज़ा | 10 वर्ष तक; चोट पर आजीवन | वही ढांचा बरक़रार |
| जमानत | गैर-जमानती | गैर-जमानती |
| कब लागू | 30 जून 2024 तक के मामले | 1 जुलाई 2024 से दर्ज मामले |
ध्यान रखें: अपराध जिस तारीख़ को हुआ, उसी समय का कानून लागू होता है — इसलिए पुराने मामलों में आज भी IPC 307 लिखा मिलेगा, नए में BNS 109।
झूठे केस में फंसे हों तो क्या करें?
- तुरंत अनुभवी आपराधिक वकील से मिलें — यह गंभीर धारा है, देरी भारी पड़ती है।
- FIR की कॉपी लें और पढ़ें कि आरोप क्या लिखा है (नीयत का ज़िक्र कैसे है)।
- अपने पक्ष के सबूत सुरक्षित रखें — CCTV, कॉल रिकॉर्ड, मैसेज, गवाहों के नाम, मेडिकल रिपोर्ट।
- अग्रिम/नियमित जमानत की अर्ज़ी वकील के ज़रिए समय पर लगवाएं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
307 और 302 में क्या फ़र्क़ है?
302 (अब BNS 103) तब लगती है जब मौत हो जाए; 307 (अब BNS 109) तब जब मारने की कोशिश हुई पर व्यक्ति बच गया। नीयत दोनों में एक जैसी होती है, नतीजा अलग।
क्या 307 में समझौता हो सकता है?
यह गंभीर, गैर-शमनीय (non-compoundable) श्रेणी का अपराध माना जाता है — आपसी समझौते से केस अपने आप ख़त्म नहीं होता; अदालत ही तय करती है।
चोट नहीं आई फिर भी 307 लग सकती है?
हाँ — अगर मारने की नीयत से किया गया कृत्य साबित हो, तो बिना चोट के भी धारा लगती है।
जमानत कितने दिन में मिल जाती है?
कोई तय समय नहीं — अदालत की सुनवाई, केस डायरी और परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
"कलम 307" का मतलब क्या है?
मराठी/गुजराती में "कलम" का मतलब धारा ही होता है — कलम 307 यानी धारा 307।
संबंधित धाराएं: धारा 354 — महिला की गरिमा पर हमला · IPC की अन्य धाराएं · कानून सेक्शन